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| किन्नर पायल के साथ एंकर शालिनी सिंह व टीम |
"किन्नर समाज से जिन लोगों को अपने बरकत के लिए लाखों दुवाओं की उम्मीदें रहती हैं, उन्हीं लोगों की सोच किन्नर समाज की भावनाओं और जज्बातों को कुचल देता है. क्या कभी किसी ने यह जानने की कोशिश की कि उन्हें आपसे क्या चाहिए ? क्या किसी ने यह जानने की कोशिश की कि जिनकी झोलियाँ दूसरों के लिए लाखों दुवावों से भरी है, उनकी खुद की झोलियाँ समाज के प्यार और सम्मान के लिए सदियों से खाली पड़ी हैं..आज किन्नर समाज के ऐसे ही असह्य वेदनाओं और सामाजिक तिरस्कार को अपने अनुभूतियों और कलम से अवगत करा रही हैं शालिनी सिंह.."
दोस्तों,
अनछुए पहलुओं पर काम करना अच्छा लगता है और अगर वो पहलू संवेदनशील मुद्दों पर हो जाने अनजाने दिल से जुड़ जाती हूँ . बचपन में जब आठवीं क्लास में थी तब हमारे स्कूल में तीसरे फ्लोर की बिल्डिंग बन रही थी इंटरवल का वक़्त था सो हम सब लंच कर रहे थे तभी अचानक स्कूल की बिल्डिंग में चीखें आनी शुरू हो गईं जिसमें बच्चों के साथ टीचरों की आवाजें भी थीं हमने ऊपर से नीचे झांककर देखा तो मारपीट हो रही थी ,भयंकर दृश्य था वो टीचरों ने खुद को कमरे में बन्द कर रखा था और चीखें जारी थीं । हिंदी की मैडम जो बुजुर्ग थीं वो बड़ी हिम्मत के साथ बाहर आकर माफी मांगती हुई विनती कर रही थीं कि ये झगड़ा बन्द करो .....इस झगड़े में खून से लथपथ कुछ मजदूर मिस्त्री और लड़के हुए थे जो निर्दोष थे लेकिन स्कूल की बिल्डिंग में कुछ बदमाश लड़कों की हरकत की वजह से हंगामा हुआ था जिसने दिल दहलाने वाले कांड को अंजाम दिया । हुआ ये की बदमाश लड़कों ने तीसरे फ्लोर से रास्ते में जाते हुए किन्नर समूह को छेड़ने और बदतमीजी से बात करने की गलती की थीं बस इसी बात से नाराज़ किन्नर समूह बिल्डिंग में घुस आया और पानी की पाइप से जो मारपीट की वो दृश्य आज भी हूबहू जहन में है ।उस दिन से किन्नर समुदाय के बारे में जानने ,उनको समझने की ललक हमेशा मन में रही ।
वक़्त के साथ शादी ब्याह ,पास पड़ोस किसी जन्म के मौकों पर आमना सामना होता ,कई बार हंसते मुस्कुराते बातचीत भी हुई । बहुत बार गुजरते हुए समूह को पानी मांगने पर पानी भी पिलाया ,पर उनकी जिंदगी से जुड़े सवाल करने का मौका नहीं मिला ......लेकिन बड़े होने के बाद इतना समझ आने लगा था कि इनकी ज़िन्दगी आसान नहीं है क्योंकि समाज में इन्हें रहने की जगह तो है पर समाज में इनकी स्वीकार्यता नहीं है न ही कोई हक़ जो एक मनुष्य को जीने के लिए आवश्यक हैं । नाचने गाने और मांग कर खाने को विवश इनकी ज़िन्दगी बहुत बुरे हालातों से गुजरती है। हालांकि आज लंबी लड़ाई के बाद इन्हें संवैधानिक रूप से थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता मिल गई है और कुछ क्षेत्रों में नौकरी के लिए भी स्वीकार्यता मिली है । आज पश्चिमी बंगाल में एक किन्नर जज बनकर अपने समाज को प्रोत्साहित करती हुई देश की पहली जज बनने की मिसाल कायम कर चुकी हैं। इन तमाम बातों के बीच एक दिन एक बुजुर्ग से बातचीत में किन्नर का जिक्र आते ही मैंने अपने मन की बात कही और कहा कि मुझे मिलना है उन्होंने बताया कि कोशिश करूंगा "क्योंकि वो जल्दी मिलती नहीं सबसे" मेरे मन में हज़ारों सवाल घूमने लगे कि जानकर भी क्या कोई मदद कर सकूँगी तब एक ख़्याल आया कि मेरे आकाशवाणी केंद्र में एक इंटरव्यू अगर सम्भव हो तो किन्नर समज्ज के दर्द ,मुश्किलों और उनकी ख़्वाहिशों को अधिक लोगों तक पहुंचा सकूँगी और समाज में इनके प्रति व्याप्त नज़रिए को बदलने की दिशा में एक सूक्ष्म प्रयास कर सकूँगी। इस सफर में सबसे पहले अपने कार्यक्रम अधिशासी से बात की उन्होंने मेरी सोच की सार्थकता को समझते हुए परमिशन दे दी उस दिन अकेले में परमिशन के बाद खूब रोइ क्योंकि मेरे एहसासों के सफर का पहला पड़ाव पार कर चुकी थी । मैंने बुजुर्ग अंकल जी को ये ख़बर सुनाई और कहा कि अब आगे की बागडोर आपके हाथ में है । वो बुजुर्ग अंकल नेचरोपैथी के डॉक्टर हैं,जो समाज में सेवाभाव रखते हैं और वो किन्नर पायल सिंह है जो एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उस समाज के लिए जीती है जो समाज उसे स्वीकार्यता नहीं देता। अंकल और पायल का 30 बरस पुराना परिचय है। और मुझसे मेरे एक लेख के सम्बंध में ही सोशल मीडिया पर संपर्क हुआ था। डॉक्टर अंकल ने बिना देर किए अगले दिन मेरी बात पायल से करवाई और अंकल के कहने पर पायल स्टूडियो आने के लिए तैयार हो गईं । सफर का दूसरा पड़ाव भी पार कर लिया मैंने । सच कहूं तो मन बहुत बेचैन था पायल को लेकर ,चूंकि किसी किन्नर के मन को पहली बार खंगालने ,जानने ,सुनने और रिकॉर्ड करने का मौका था और मेरे रेडियो के बारह सालों के सफ़र का सबसे ख़ास पल आने वाला था तो चिंता स्वाभाविक थी। हमने और हमारे कार्यक्रम की टीम ने पूरी तैयारी कर ली थी सबको इंतज़ार था पायल का। और मुझे फिक्र कि पायल के आत्मसम्मान को किसी भी बात से ठेस न पहुंचे क्योंकि पायल के आने की ख़बर आकाशवाणी में हमारे सेक्शन में ही थी सिर्फ इसलिए एहतियात बरतते हुए हमने पायल को सीधे स्टूडियो में ही ले जाने का निर्णय लिया था। आखिरकार वो वक़्त आ गया जब पायल आईं और उन्होनें मुझे फोन पर सूचित किया । मैंने सम्मान सहित उनको रिकॉर्डिग कक्ष में बिठाकर अपने कार्यक्रम अधिकारी को सूचित किया । थोड़ी देर में स्टूडियो में सारी तैयारी हो गई । इंटरव्यू में पायल से बातचीत के लिए सर आ गए और उत्सुकतावश कुछ और लोग भी स्टूडियो में साथ मौजूद रहे जिसमें एंकर और सेक्शन की दो मैडम थीं। इंटरव्यू में एक सधी हुई बातचीत के साथ पायल ने अपनी जिंदगी के कई पहलुओं पर बात की । पायल ने जैसे जैसे बोलना शुरू किया वैसे वैसे जज़्बातों के भंवर सबके मन पर डोलने शुरू हो गए थे । सर का चेहरा इंटरव्यू लेते समय बेहद भावुक होता गया और मेरे आंसू गिरते गये में पोंछती गई और बाकी उपस्थित लोग भी भावनाएं के सैलाब में डूबते उतराते रहे और एंकर देवेश अपने आंसुओं को छुपाते पुस्तक मेले की उस अधूरी सी ख्वाहिश में खोए रहे जिसमें महेंद्र भीष्म द्वारा किन्नर पायल पर लिखी गई पुस्तक "मैं पायल" का लोकार्पण हुआ था और मिलने की ख्वाहिश व्यक्त करने पर एक दोस्त ने कहा था कि " उससे क्या मिलोगे ,साले मर्द हो कि हिजड़ा ,जो एक हिजड़े से मिलोगे"
ये कटाक्ष आज देवेश को भीतर से कुछ ज्यादा ही चुभता महसूस हुआ था जिसे उसने इंटरव्यू की रिकॉर्डिंग के बाद मुझसे बहुत भावुक होकर साझा किया । आधे घण्टे रिकॉर्डिंग में बहुत सी बातें सुनीं,उसमें पायल का एक महत्वपूर्ण सन्देश है जो वो समाज में देना चाहती हैं वो ही क्यों हमारे कार्यक्रम की पूरी टीम भी उनके इस सन्देश में उनके साथ हर क़दम पर है..... पायल ने कहा कि "माँ - बाप एक अपाहिज संतान को ज़िन्दगी भर कंधे पर ढोने के लिए दिल रखते हैं जिंदगी भर उनका विशेष ख़्याल रखते हैं ,उन्हें दूसरों के तानों से बचाते हैं उनके लिए दर -दर ठोकरें भी खाते हैं और बहुत प्यार करते हैं तो हम किन्नर भी तो उन्हीं की औलाद हैं जो एक विकृति के साथ जन्म लेते हैं जिसमें हमारा कोई दोष भी नहीं होता ,फिर भी हमें अपने समाज से बाहर फेंक देते हैं हम भी मनुष्य रूप में जन्मे हैं हममें भी भावनाएं हैं और हममें वो योग्यता भी है जो माँ -बाप की सेवा करके उनका ख्याल रख सकें हम भी पढ़ लिखकर समाज में अपने कर्त्तव्य निर्वाह कर सकते हैं तो फिर क्यों नहीं एक अपाहिज ही समझकर हमें हमारे हिस्से का प्यार दे देते।"
पायल की बातें जायज भी हैं कि वो मां नहीं बन सकतीं लेकिन मां का दिल रखती हैं अनाथ बच्चों की परवरिश करके उन्हें सफल इंसान बनाने से लेकर फिल्मों के माध्यम से लोगों की सोच बदलने का कार्य कर रही पायल का जीवन प्रेरणादायक है। जो इंसानियत का पाठ पढ़ाता है। सोचने की ज़रूरत है कि क्या हमारे समाज में एक बांझ स्त्री को घर के बाहर निकाल दिया जाता है ।? मातृत्व की भावना के चलते सुष्मिता सेन, रवीना टंडन,एकता कपूर जैसे तमाम सक्षम लोग गोद लेकर समाज में सम्मान पाते हैं और दिलों में बिठाए जाते हैं। लेकिन किन्नर समाज थोड़े से प्यार और संवेदना की खातिर दोगली मानसिकता से भरे समाज के लिए जान देने को तैयार दिखता है फिर भी महज कोरी बातों, अपमान ,हंसी ठिठोली और चंद पल की सहानुभूति से ज़्यादा समाज के पास देने को कुछ नहीं है।
सोच कर देखने की और अमल में लाने की ज़रूरत है कि किन्नर समाज को हम अपने जीवन में किस प्रकार समाहित कर सकते हैं किस प्रकार उनके जीवन यापन के लिए विकल्प तैयार कर सकते हैं किस प्रकार रोजगार के साधन तैयार करके उन्हें स्वावलंबी बना सकते हैं । और सबसे महत्त्वपूर्ण क़दम कि क्या हम उन्हें अपने मित्र, भाई, बहन , जैसे अपनेपन के रिश्तों में बिना किसी संकोच के स्वीकार कर सकते हैं ......... दोस्तों एक जानवर भी विपरीत परिस्थितियों में दूसरे समुदाय के बच्चों को प्यार करता है और अपने साथ शामिल कर लेता है इस बात के जाने कितने प्रमाण अक्सर सामने आते हैं ,फिर हम तो मनुष्य हैं सभ्यता की दौड़ में सबसे विकसित ,विवेकशील, समझदार प्राणी और स्वीकारने के लिए किसी दूसरे समुदाय को नहीं खुद के जन्मे हुए एक विकृत किंतु बौद्धिक मानवीय गुणों से भरे हुए अपने ही अंश की ख़ातिर खुद को तैयार करना है और उन्हें स्पेशल चाइल्ड की तरह बचपन से लेकर वयस्क होने तक पढ़ने-लिखने और सामान्य जीवन जीने के लिए तैयार करना है।
आज संवैधानिक मान्यता मिल गई है लेकिन सामाजिक मान्यता के बगैर सामान्य परिस्थिति तैयार करना सम्भव नहीं है।
फिलहाल मेरी कल्पनाओं को स्वरूप मिला पायल के इंटरव्यू के रूप में और पायल की ख्वाहिशों को पंख लगे खुशियों के और वो बुजुर्ग डॉक्टर अंकल एक संतुष्टि के भाव से लबरेज हैं ।वजह सिर्फ एक है कि किन्नर समाज को समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाये जाने की हम सबकी कोशिशों का सफ़र जारी है जिसमें पायल की उम्मीदों को पंख लगे हैं क्योंकि पायल की बात,पायल के जज़्बात और पायल के प्रयास को आकाशवाणी के कार्यक्रम में प्रसारित किया जा रहा है जो बहुत लोगों तक पहुंचेगी और उनमें से कुछ लोग तो सोचने पर मजबूर होंगे और हो सकता है कि उन्हीं में से कोई क्रांति की चिंगारी जलाने के लिए कभी आगे आये और फिर चिंगारी मशाल बन कर रौशनी बन जाये किन्नर समाज की पायल , गुड़िया ,मुन्नी जैसी हज़ारों ,लाखों अभिशप्त किंतु पवित्र आत्माओं के लिए जिनकी दुआओं में बरकत और खुशियों की नेमत बरसती है ,लेकिन अफसोस ज़िन्दगी भर ये पवित्र आत्माएं अपनेपन की छांव को तरसती हैं।
शालिनी सिंह
(रेडियो एंकर, आकाशवाणी)
लखनऊ .


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