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मुम्बई -  जून 2018 बाबूराव विष्णु पराड़कर  हिन्दी के जाने-माने पत्रकार, साहित्यकार एवं हिन्दी सेवी थे। उन्होने हिन्दी दैनिक 'आज' का सम्पादन किया भारत की आजादी के आंदोलन में अखबार को बाबूराव विष्णु पराड़कर ने एक तलवार की तरह उपयोग किया | उनकी पत्रकारिता ही क्रांतिकारिता थी। उनके युग में पत्रकारिता एक मिशन हुआ करता था।एक जेब में पिस्तौल, दूसरी में गुप्त पत्र 'रणभेरी' और हाथों में 'आज', 'संसार' कमला जैसे पत्रों को संवारने, जुझारू तेवर देने वालि लेखनी के धनी पराडकर जी ने जेल जाने, अखबार की बंदी, अर्थदंड जैसे दमन की परवाह कीए बगैर पत्रकारिता का वरण किया | मुफलिसी में सारा जीवन न्यौछावर करने वाले पराड़कर जी ने आजादी के बाद देश की आर्थिक गुलामी के खिलाफ धारदार लेखनी चलाई।मराठी भाषी होते हुए भी हिंदी के इस सेवक की जीवनयात्रा अविस्मरणीय है। इनके जीवन को कमलाश्री फ़िल्म्स प्रा •लि धारावाहिक "रणभेरी " के द्वितीय संस्करण में दिखायेगा , ये बाते निर्माता -निर्देशक दिलीप सोनकर ने कही , अपने इस महत्वाकांक्षी धारावाहिक  के निर्माण की तैयारियां शुरू कर दी है , दिलीप ने बताया की इस धारावाहिक की गाथा सन 1903 से पराड़कर जी  के बचपन से शुरू किया जायेगा ,  धारावाहिक में काशी के सांस्कृतिक महत्व और काशी के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ पराड़कर जी ने किस प्रकार आज़ादी में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है सभी पहलुओं को दर्शाया जायेगा , ताकी देश की नव -जवान पीढ़ी को अनगिनत क़ुर्बानियो के बदले मिली आज़ादी के मूल्य का आकलन कराया जा सके |दिलीप ने बताया की किस प्रकार राष्ट्रीय आन्दोलन जब अपनी धार पकड़ रहा था और महात्मा गांधी की वैचारिक जमीन जोती जा रही थी, तब १९३० में बनारस में बाबू विष्णु राव पराड़कर ने रणभेरी अखबार निकाला था। स्वतंत्रता के आंदोलन में बनारस की उल्लेखनीय भूमिका का चेहरा थी रणभेरी। १९३० से १९४७ तक १७ वर्षों में कुल १२ बार इस अखबार को अंग्रेजी सरकार के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। फिर भी कभी छुपछुपाकर तो कभी सीनाजोरी से निकलती ही रही रणभेरी। अंग्रेज सरकार के लिए बहुत दुष्कर हो गया था कलम के सिपाहियों से पार पाना। बनारस की अनजान गलियों और बेनाम मुहल्लों से संचालित होती रहीं इसकी गतिविधियां। राष्ट्र रत्न बाबू शिवप्रसाद गुप्त, पंडित कमलापति त्रिपाठी, लाल बहादुर शास्त्री, संपूर्णांनन्दजी, मदन मोहन मालवीय ,भगवान दास ,राजाराम शास्त्री ,संम्पूर्णानन्द ,रामेश्वर प्रसाद चौरसिया, दुर्गा प्रसाद खत्री ,मन्मथनाथ गुप्त, शचीन्द्रनाथ सान्याल... एक लम्बी पेहरिस्त है बनारस के उन नामों की जो राष्ट्रीय आंदोलन को दिशा भी देते रहे और रणभेरी जैसी प्रतीक संघर्षोंं का गुरिल्ला संचालन भी करते रहे। रणभेरी की प्रतियां पान की गिलौरियों के बीच तश्तरियों में छिपाकर बांटी जाती थीं। अंग्रेज पुलिस इस बात के लिए हलकान रहती थी की कब और कहां से प्रगट हो जाती है शब्दों के जरिये मार करने वाली रणभेरी। आजादी मिली तो इतिहास का यह पन्ना भी खामोश हो गया। लेकीन रणभेरी की दस्तक बनारस के लोगों के कानों में तब पड़ी जब इसे दूरदर्शन के नेशनल चैनल पर धारावाहिक के रूप में पूरे देश ने देखा , सोनकर  द्वारा निर्मित्त  इस धारावाहिक को एक -एक घंटे  के 61 कड़ियों में  8 महीने तक प्रसारित किया गया था , जिसमें टीवी और बॉलीवुड के नामचीन कलाकारों ने भाग लिया,जिसमें गीत संगीत स्वर्गीय रवींद्र जैन का था , जो बेहद ही सफल रहा है , बाद में दूरदर्शन ने दोबारा प्रसारित किया और इसको कई भाषाओ में डब किया गया , धारावाहिक के प्रथम संस्करण में सन 1942 के अंग्रेजो भारत छोड़ो के विभिन्न मुद्दों पर प्रकाश डाला गया था | अब  इसी रणभेरी की पूरी कहानी पराड़कर जी के हिंदी पत्रकारिता के भीष्म पितामाह बनने तक के जीवन दर्शन और उनके  संघर्षों के साथ फिल्मायी जाएगी  और इस धारावाहिक को एक बार फिर दूरदर्शन पर  प्रसारित करने के लिए दिया जायेगा | कमलाश्री फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले बनने वाले इस धारावाहिक में इतिहास के कई पन्ने खुलेंगे| यह  जानकारी  रणभेरी  के कलाकार  और मीडिया  प्रभारी  श्री  विजय देवल ने दी . 

पी न्यूज़ (डिजिटल डेस्क) 
       लखनऊ 

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