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नवरात्रि– हालांकि नवरात्रि वर्ष में चार बार पौष, चैत्र, आषाढ व अश्विन महिनों की प्रतिपदा यानी एकम् से नवमी तक का समय होता है, लेकिन चैत्र मास व आश्विन मास की नवरात्रि को ही अधिक महत्‍व दिया जाता है जबकि दिपावली से पहले आने वाली आश्विन मास की नवरात्रि को भारतीय संस्‍कृति में अत्‍यधिक महत्‍व प्राप्‍त है क्‍योंकि पितृपक्ष के 16 दिनों की समाप्ति के बाद आश्विन मास की नवरात्रि का पदार्पण होता है और इसी नवरात्रि से सम्‍पूर्ण भारत में लगातार त्‍योहारों का समय शुरू हो जाता है जो कि दिपावली के बाद लाभ पांचम और इससे भी आगे छोटी दिपावली तक चलता है और इसीलिए आश्विन मास की इस नवरात्रि को हिन्‍दु धर्म में अति महत्‍वपूर्ण स्‍थान प्राप्‍त है।
नवरात्रि शब्‍द संस्‍कृत भाषा के दो शब्‍दों नव व रात्रि का संयोजन है जो इस त्‍यौहार के लगातार नौ रातों तथा दस दिनों तक मनाए जाने को इंगित करता है। भारतीय संस्‍कृति के अनुसार दुर्गा का मतलब जीवन के दु:ख कॊ हटानेवाली होता है और नवरात्रि, मां दुर्गा को अर्पित एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है जिसे सम्‍पूर्ण भारतवर्ष में अत्‍यधिक उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस नवरात्रि के दौरान देवी दुर्गा के नौ दिव्‍य रूपों की पूजा-अर्चना, उपासना व आराधना आदि की जाती है। मां दुर्गा के नौ दिव्‍य रूपों का नाम व संक्षिप्‍त वर्णन निम्‍नानुसार हैं:-
  • शैलपुत्री – पहाड़ों की पुत्री होता है।
  • ब्रह्मचारिणी – ब्रह्मचारीणी।
  • चंद्रघंटा – चाँद की तरह चमकने वाली।
  • कूष्माण्डा – पूरा जगत उनके पैर में है।
  • स्कंदमाता – कार्तिक स्वामी की माता।
  • कात्यायनी – कात्यायन आश्रम में जन्‍मी।
  • कालरात्रि – काल का नाश करने वाली।
  • महागौरी – सफेद रंग वाली मां।
  • सिद्धिदात्री – सर्व सिद्धि देने वाली।
नवरात्रि के सबसे महत्‍वपूर्ण नौ दिनाें की शुरूआत हिन्‍दु धर्म के पंचांग के अनुसार अश्विन मास के शुक्‍ल पक्ष के प्रथम दिन से होती है आैर अश्विन मास के शुक्‍ल पक्ष की दशमी, जिसे विजया दशमी अथवा दशहरा के नाम से भी जाना जाता है, पर समाप्‍त होती है।
नवरात्रि का त्‍यौहार मूलत: मां दुर्गा के तीन मुख्‍य रूपों पार्वती, लक्ष्‍मी और सरस्‍वती को समर्पित किया गया है और इन तीनों देवियों को नवरात्रि के तीन-तीन दिन के समूहों में विभाजित किया गया है।
  1. नवरात्रि के प्रथम तीन दिन के समूह को देवी दुर्गा को समर्पित किया गया हैं, जो कि शक्ति और ऊर्जा की देवी हैं और मान्‍यता ये है कि मां दुर्गा के इन तीन दिनों की आराधना से मनुष्‍यों को शक्ति व उर्जा की प्राप्ति होती है, जिससे वे अपने जीवन में मनचाहे कार्यों में सफलता प्राप्‍त करते हैं।
  2. नवरात्रि के अगले तीन दिन के समूह को देवी लक्ष्‍मी को समर्पित किया गया है, जो कि धन और समृद्धि की देवी है और मान्‍यता ये है कि मां दुर्गा के इन तीन दिनों की पूजा-अर्चना व आराधना से घर में कभी भी धन व समृद्धि की कमी नहीं होती। जबकि
  3. नवरात्रि के अंतिम तीन दिनों के समूह को देवी सरस्‍वती को समर्पित किया गया है और मान्‍यता ये है कि मां दुर्गा के इन तीन दिनों में की गई आराधना से भौतिक व अध्‍यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है, जो कि जीवन काे उचित दिशा में लेजा ने में सहायक होती हैं।
नवरात्रि के अन्तिम तीन दिनों को मां सरस्‍वती को इसीलिए समर्पित किया गया है ताकि पहले तीन दिनों में प्राप्‍त होने वाली उर्जा व शक्ति तथा अगले तीन दिनों में प्राप्‍त होने वाली धन व समृद्धि को न्‍यायपूर्ण तरीके से केवल ज्ञान द्वारा ही नियंत्रण में रखा जा सकता है और हिन्‍दु धर्म के अनुसार मां सरस्‍वती, ज्ञान की देवी हैं।
भारतीय संस्‍कृति में शक्ति की उपासना मां के रूप में की जाती है और माना जाता है कि सम्‍पूर्ण संसार की उत्पित्ति का मूल कारण शक्ति ही है जिसे ब्रम्‍हा, विष्‍णु व भगवान शिव तीनों ने मिलकर मां नवदुर्गा के रूप में श्रृजित किया था। इसलिए मां दुर्गा में वास्‍तव में ब्रम्‍हा, विष्‍णु व भगवान शिव तीनों की शक्तियां हैं अत: नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की आराधना, उपासना, पूजा-पाठ आदि करने से ब्रम्‍हा, विष्‍णु व भगवान शिव, तीनों ही की आराधना हो जाती है और इसीलिए नवरात्रि के दौरान लगातार नौ रात्रियों तक मां दुर्गा के विभिन्‍न रूपों की विभिन्‍न तरीकों से उपासना की जाती है।
नवरात्र शब्‍द से नव अहोरात्रों यानी विशेष रात्रियों का बाेध हाेता है और इस समय शक्ति के नौ रूपों की उपासना की जाती है। इन रात्रियों को सिद्ध रात्रियों के रूप में भी जाना जाता है क्‍योंकि भारतीय तंत्र शास्‍त्र के अनुसार रात्रि शब्‍द सिद्धि का प्रतीक है और मान्‍यता ये है कि इन रात्रियों में तंत्र-मंत्र की साधना करने पर अन्‍य दिनों की तुलना में ज्‍यादा जल्‍दी से सिद्धियां प्राप्‍त हो जाती हैं। इसलिए नवरात्रि की ये अवधि तंत्र-मंत्र साधनाओं के लिए भी विशेष उपयोगी व बलशाली मानी गई हैं।

कब से मनाया जाने लगा नवरात्रि का त्‍यौहार ?

नवरात्रि का त्‍यौहार मनाने से सम्‍बंधित बहुत सारी पौराणिक कहानियां, कथाऐं व घटनाऐं हैं और ऐसा माना जाता है कि सर्वप्रथम भगवान श्रीराम ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ श्री लंका पर चढाई करने से पहले समुद्र तट पर किया था ताकि वे श्रीलंका के राजा रावण पर विजय प्राप्‍त कर सकें और नौ दिन तक मां दुर्गा की शक्ति उपासना करने के बाद दसवें दिन उन्‍होंने लंका विजय के लिए प्रस्थान किया था, जिसमें अन्तिम रूप से उनकी विजय हुई थी और माना जाता है कि तभी से असत्य, अधर्म पर सत्य व धर्म की जीत काे, पर्व दशहरा के रूप में मनाया जाता है और दशहरे से पहले के नौ‍ दिनों को नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। इस संदर्भ में भगवान श्री राम की कहानी भी कम रोचक नहीं है।

नवरात्रि और श्रीराम व रावण का चण्‍डी पाठ – दुर्गा सप्‍तशती पाठ

जब भगवान श्री राम, श्रीलंका पर आक्रमण कर माता सीता को रावण के चंगुल से मुक्‍त करना चाहते थे, तो ब्रह्माजी ने श्रीराम से रावण वध के लिए चंडी देवी का पूजन कर देवी को प्रसन्न करने को कहा क्‍योंकि एक तो रावण स्‍वयं एक ब्राम्‍हण था, बहुत ही विद्वान था और न केवल शास्‍त्रों का बल्कि शस्‍त्रों का भी प्रकाण्‍ड पण्डित था इसलिए श्रीराम के लिए भी एक सामान्‍य क्षत्रिय के रूप में रावण को हराना व उसका वध करना सम्‍भव नहीं थी। मान्‍यताऐं तो ऐसी भी हैं कि रावण इतना शक्तिशाली था कि मृत्‍यु का देवता यम भी रावण के महल के बाहर पहरा दिया करता था।
इस स्थिति में एक ब्राम्‍हण की हत्‍या से लगने वाले पाप से बचने के लिए श्री राम को ब्रम्‍हा जी के आशीर्वाद की जरूरत थी। जबकि स्‍वयं रावण, भगवान शिव का परम भक्‍त था, इसलिए रावण का वध करने पर भगवान राम को भगवान शिव के कोप को भी सहना पडता। इन कई तरह की अनचाही परिस्थितियों से बचने के लिए ही ब्रम्‍हाजी ने भगवान राम को चंडी देवी यानी मां दुर्गा का पूजन करने के लिए कहा था क्‍योंकि मां दुर्गा को ब्रम्‍हा, विष्‍णु व भगवान शिव तीनों की शक्ति माना जाता है और जिस पर भी मां दुर्गा का आशीर्वाद होता है, माना जाता है कि उसे ब्रम्‍हा, विष्‍णु व भगवान शिव तीनों का आशीर्वाद प्राप्‍त है।
लेकिन क्‍योंकि रावण भी कम ज्ञानी नहीं था, इसलिए उसे भी पता था कि भगवान राम पर विजय प्राप्‍त करनी है, तो मां चण्‍डी के आशीर्वाद की जरूरत उसे भी पडेगी, इसलिए न केवल भगवान राम, बल्कि राजा रावण भी नवरात्रि के दौरान दानवों के गुरू शुक्र की आज्ञा से माता दुर्गा की उपासना कर रहा था।
ब्रम्‍हाजी के बताए अनुसार भगवान राम को चंडी पूजन और हवन हेतु दुर्लभ एक सौ आठ नीलकमल को माता दुर्गा को अर्पित करना था, इसलिए सौ नीलकमलों की व्यवस्था की गई थी।
लेकिन क्‍योंकि राजा रावण राक्षस कुल से था इसलिए मायावी भी था और जब उसे पता चला कि श्रीराम जी माता चण्‍डी को प्रसन्‍न करने के लिए उन्‍हें 100 नीलकमल अर्पित करेंगे, तो उनकी उपासना को खण्डित करने के लिए अपनी मायावी शक्ति से 1 नीलकमल गायब कर दिया।
यह बात इंद्र देव ने पवन देव के माध्यम से श्रीराम के पास पहुँचाई और परामर्श दिया कि किसी भी स्थिति में चंडी पाठ जिसे अन्‍य शब्‍दों में दुर्गा सप्‍तशती पाठ भी कहा जाता है, पूर्ण होना ही चाहिए।  जब ये बात श्रीराम जी को पता चली तब तक वे अपना पाठ शुरू कर चुके थे और बीच में पाठ को छोडा नहीं जा सकता था, न ही गायब हुए नीलकमल को प्राप्‍त किया जा सकता था, न ही एक और नीलकमल की व्‍यवस्‍था की जा सकती थी।
परिणामस्‍वरूप भगवान श्रीराम जी को अपना 100 नीलकमल अर्पित करने का संकल्प टूटता हुआ सा लगने लगा। उन्‍हें भय इस बात का था कि 1 नीलकमल की कमी से कहीं देवी माँ रुष्ट न हो जाएँ। साथ ही दुर्लभ नीलकमल की तत्काल व्यवस्था भी असंभव थी, तब भगवान राम को सहज ही स्मरण हुआ कि लोग उन्‍हें इसीलिए ‘कमलनयन नवकंच लोचन’ कहते हैं क्‍योंकि उनकी आंखें नील कमल की पंखुडियों के समान हैं।
इस बात का स्‍मरण होते ही अपने संकल्प की पूर्ति हेतु अपना एक नेत्र अर्पित करने के लिए तत्‍पर हो गए और प्रभु राम जैसे ही तूणीर से एक बाण निकालकर अपना नेत्र निकालने के लिए तैयार हुए, देवी चण्‍डी प्रकट हो गईं और श्रीराम का हाथ पकड़कर कहा कि वे राम की भक्ति से प्रसन्न हैं और श्रीराम जी को विजयश्री का आशीर्वाद दिया।
वहीं दूसरी ओर रावण ने भी अमरता के लोभ में विजय कामना से वही चंडी पाठ प्रारंभ किया था व चंडी पाठ के लिए अपने राज्‍य के महान ब्राम्‍हणों को नि‍युक्‍त किया था, जहां उन ब्राह्मणों की सेवा में एक ब्राह्मण बालक का रूप धरे स्‍वयं हनुमानजी जुट गए। हनुमानजी की निःस्वार्थ सेवा देखकर चण्‍डी पाठ करने वाले उन ब्राह्मणों ने हनुमानजी से वर माँगने को कहा। इस पर हनुमान ने विनम्रतापूर्वक कहा-
प्रभु, यदि आप मेरी सेवा से प्रसन्न हैं तो आप जिस मंत्र से यज्ञ कर रहे हैं, उसका केवल एक अक्षर मेरे कहे अनुसार बदल दीजिए।
माना जाता है कि हनुमानजी स्‍वयं भगवान शिव का अवतार हैं और भगवान शिव से अधिक शास्‍त्रों का ज्ञानी अन्‍य कोई नहीं हैं, इसलिए हनुमान जी चण्‍डी पाठ के लिए उच्‍चारित किए जा रहे एक-एक मंत्र का गूढ अर्थ जानते थे, जबकि मंत्रों का इतना गहन ज्ञान उन ब्राम्‍हणों को नहीं था। सो वे ब्राह्मण, हनुमानजी के इस रहस्य को समझ न सके और तथास्तु कह दिया और हनुमानजी ने चण्‍डीपाठ के जयादेवी… भूर्तिहरिणी वाले मंत्र में ‘‘ के स्थान पर ‘‘ उच्चारित करने का निवेदन किया, जिसे उन ब्राम्‍हणों ने मान लिया।
अब केवल इस एक अक्षर मात्र को बदल देने से भूर्तिहरिणी के स्‍थान पर ब्राम्‍हणों ने भर्तिकरिणी शब्‍द का उच्‍चारण करना शुरू कर दिया जबकि ‘भूर्तिहरिणी’ का अर्थ होता है प्राणियों की पीड़ा हरने वाली और ‘भूर्तिकरिणी‘ का अर्थ हो गया प्राणियों को पीड़ित करने वाली,
उच्‍चारण के इस परिवर्तन मात्र से माता चण्‍डी का पाठ विकृत हो गया, जिससे देवी रुष्ट हो गईं और रावण को अमरता प्रदान करने के स्‍थान पर उसका सर्वनाश करवा दिया।

नवरात्रि और महिषासुर वध=

श्रीराम जी की इस कहानी के अलावा नवरात्रि के त्‍यौहार को मनाने से सम्‍बंधित एक और पौराणिक कहानी का उल्‍लेख भी मिलता है, जिसके अन्‍तर्गत महिषासुर नाम के एक असुर का माता दुर्गा द्वारा वध किया जाता है। कथा कुछ इस प्रकार है कि-
एक बार दैत्यराज महिषासुर ने कठोर तप करके देवताओं से अजैय होने का वरदान प्राप्‍त कर लिया। फलस्वरूप महिषासुर ने नरक का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और स्‍वर्ग पर आक्रमण कर दिया। देव-दानव युद्ध के दौरान देवताओं और राक्षसों में सौ वर्ष तक छलबल और शक्ति बल से युद्ध चलता रहा। राक्षसों का राजा महिषासुर नाम का दैत्य था, जबकि देवताओं के राजा इंद्र थे। इस युद्ध में कई बार देवताओं की सेना राक्षसों से पराजित हो गई। एक समय ऐसा आया, जब देवताओं पर विजय प्राप्त करके महिषासुर ने इंद्र का सिंहासन हासिल कर लिया।
जब सभी देवता पराजित हो गए, तो वे ब्रह्मा जी के नेतृत्व में भगवान विष्णु और भगवान शंकर की शरण में गए। देवताओं ने बताया कि महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और स्वयं स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा है तथा देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण करना पड़ रहा है।
ये बात सुन भगवान विष्णु और भगवान शिव अत्यधिक क्रोधित हुए और उनके क्रोध के कारण एक महान तेज प्रकट हुआ। अन्य देवताओं के शरीर से भी एक तेजोमय शक्ति मिलकर उस तेज में मिल गई। यह तेजोमय शक्ति एक पहाड़ के समान थी जिसकी ज्वालाएं दसों-दिशाओं में फैल रही थीं। यह तेजपुंज सभी देवताओं के शरीर से प्रकट होने के कारण एक अलग ही स्वरूप लिए हुए था जिससे इस प्रकाश से तीनों लोक भर गए।
तभी भगवान शंकर के तेज से उस देवी का मुख मंडल प्रकट हुआ। यमराज के तेज से देवी के बाल,  भगवान विष्णु के तेज से देवी की भुजाएं, चंद्रमा के तेज से देवी के दोनों स्तन, इन्द के तेज से कटि और उदर प्रदेश, वरुण के तेज से देवी की जंघायें और ऊरू स्थल, पृथ्वी के तेज से नितम्ब, ब्रह्मा जी के तेज से देवी के दोनों चरण और सूर्य के तेज से चरणों की उंगलियां, वसुओं के तेज से हाथों की उंगलियां तथा कुबेर के तेज से नासिका यानि नाक का निर्माण हुआ। प्रजापति के तेज से दांत, संध्याओं के तेज से दोनों भौएं और वायु के तेज से दोनों कानों का निर्माण हुआ और इस तरह से सभी देवताओं के तेज से एक कल्याणकारी देवी का प्रादुर्भाव हुआ। चूंकि इन देवी की उत्पत्ति महिषासुर के अंत के लिए हुई थी, इसलिए इन्हें ‘महिषासुर मर्दिनी‘ कहा गया।
समस्त देवताओं के तेज पुंज से प्रकट हुई देवी को देखकर पीड़ित देवताओं की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। भगवान शिव ने शस्‍त्र के रूप में अपना त्रिशूल देवी को दिया। भगवान विष्णु ने भी अपना चक्र देवी को प्रदान किया। इसी प्रकार, सभी देवी-देवताओं ने अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र देवी के हाथों में सजा दिये। इंद्र ने अपना वज्र और ऐरावत हाथी से उतारकर एक घंटा देवी को दिया गया। सूर्य ने अपने रोम कूपों और किरणों का तेज भरकर ढाल, तलवार और दिव्य सिंह यानि शेर को सवारी के लिए उस देवी को अर्पित कर दिया। विश्वकर्मा ने कई अभेद्य कवच और अस्त्र देकर महिषासुर मर्दिनी को सभी प्रकार के बड़े-छोटे अस्त्रों से शोभित किया।
अब बारी थी महिषासुर से युद्ध की। थोड़ी देर बाद महिषासुर ने देखा कि एक विशालकाय रूपवान स्त्री अनेक भुजाओं वाली और अस्त्र शस्त्र से सज्जित होकर शेर पर बैठकर अट्टहास कर रही है। महिषासुर की सेना का सेनापति आगे बढ़कर देवी के साथ युद्ध करने लगा। उदग्र नामक महादैत्य भी 60 हजार राक्षसों को लेकर इस युद्ध में कूद पड़ा। महानु नामक दैत्य एक करोड़ सैनिकों के साथ, अशीलोमा दैत्य पांच करोड़ और वास्कल नामक राक्षस 60 लाख सैनिकों के साथ युद्ध में कूद पड़े। सारे देवता इस महायुद्ध को बड़े कौतूहल से देख रहे थे।
दानवों के सभी अचूक अस्त्र-शस्त्र देवी के सामने बौने साबित हो रहे थे, लेकिन देवी भगवती अपने शस्त्रों से राक्षसों की सेना को निशाना बनाने लगीं। रणचंडिका देवी ने तलवार से सैकड़ों असुरों को एक ही झटके में मौत के घाट उतार दिया। कुछ राक्षस देवी के घंटे की आवाज से मोहित हो गए। देवी ने उन्‍हें तुरंत पृथ्वी पर घसीट कर मार डाला।
उधर, देवी का वाहन शेर भी क्रोधित होकर दहाड़ मारने लगा। वह राक्षसों की सेना से प्रचंड होकर इस तरह घूमने लगा, जैसे जंगल में आग लग गई हो। शेर की सांस से ही सैकड़ों हजारों गण पैदा हो गए। देवी ने असुर सेना का इस प्रकार संहार कर दिया, मानो तिनके और लकड़ी के ढेर में आग लगा दी गई हो। इस युद्ध में महिषासुर का वध तो हो ही गया, साथ में अनेक अन्य दैत्य भी मारे गए जिन्‍होंने लम्‍बे समय से आतंक फैला रखा था। मान्‍यता ये है कि महिषासुर के साथ माता दुर्गा का ये युत्र नौ‍ दिनों तक चला था और इसी वजह से माता दुर्गा की स्‍तुति करने के लिए ही नवरात्रि के इस त्‍यौहार को नौ दिनों तक मनाया जाता है।
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कैसे मनाते हैं नवरात्रि ?=

जिस प्रकार से गणपति उत्‍सव को महाराष्‍ट्र में एक बहुत बडे उत्‍सव की तरह मनाया जाता है, उसी तरह से नवरात्रि को गुजरात में एक बहुत ही बडे पर्व की तरह मनाते हैं अौर मान्‍यता ये है कि नौ दिनों तक गुजरात व सौराष्‍ट्र में हर रोज सुबह-सुबह घर के बाहर रंगोली बनाई जाती है, पूरा दिन व्रत-उपवास किया जाता है और रात्रि को गरबा व डांडिया के माध्‍यम से माता दुर्गा को प्रसन्‍न किया जाता है। जबकि गुजरात के अलावा पूरे देश में नवरात्रि को पूर्ण आस्‍था व श्रृद्धा के साथ मनाया जाता है।
नवरात्रि की इस अवधि में अलग-अलग स्‍थानों पर अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीके से मां दुर्गा की उपासना करते हैं। कुछ लोग दुर्गा-सप्‍तशती का पाठ करते हैं, कुछ लोग अखण्‍ड नवरात्रि व्रत करते हैं तो कुछ लोग हर रोज गरबा-डांडिया के माध्‍यम से मां दुर्गा की आराधना-उपासना करते हैं।
अलग-अलग लोगों के मां दुर्गा के इस उत्‍सव को मनाने का तरीका अलग-अलग हो सकता है, लेकिन पितृपक्ष के अन्‍त के के साथ ही इस त्‍यौहार के आते ही बाजार में रौनक आ जाती है, क्‍योंकि पितृपक्ष में कोई नया सामान नहीं खरीदा जाता न ही कोई मांगलिक कार्य किया जाता है। साथ ही शरद ऋ‍तु की इस नवरात्रि से ही त्‍याैहारों का मौसम शुरू हो जाता है जो कि लगभग 45 दिनों तक चलता है और लगातार आने वाले त्‍यौहारों की शुरूआत नवरात्रि के साथ होती है, इसलिए नवरात्रि के इस उत्‍सव को काफी हर्षोल्‍लास के साथ मनाया जाता है।

दुर्गा सप्‍तशती या चण्‍डी पाठ और सावधानियां=

जैसाकि श्रीराम जी की पौराणिक कथा से हम समझ सकते हैं कि कैसे हनुमानजी महाराज ने श्लोक में ‘‘ की जगह ‘‘ करवाकर रावण के यज्ञ की दिशा ही बदल दी, वास्‍तव में ये कहानी सभी चण्‍डीपाठ यानी दुर्गा सप्‍तशती का पाठ करने वालों को एक संकेत दे रही है कि चण्‍डीपाठ वास्‍तव में काफी तीव्र परिणाम देने वाला पाठ है फिर इस बात से फर्क नहीं पडता कि परिणाम अच्‍छा है या बुरा। इसलिए यदि आप ये पाठ करने जा रहे हैं, तो कुछ सावधानियां बरतना आपके लिए बहुत ही जरूरी है अन्‍यथा अच्‍छे के स्‍थान पर बुरे परिणाम भी भोगने पड सकते हैं, जो कि चण्‍डी पाठ करने वाले प्रत्‍येक व्‍यक्ति का अनुभव है।
चण्‍डी पाठ करते समय जिस कमरे में माता दुर्गा की स्‍थापना की जाती है, उस कमरे को शुद्ध, स्‍वच्‍छ, शान्‍त व सुगंधित रखा जाता है। इस बात का विशेष ध्‍यान रखा जाना जरूरी होता है कि माता दुर्गा के स्‍थापित स्‍थान या मंदिर के आस-पास या मंदिर में किसी भी प्रकार की अशुद्धता न हो। विशेष रूप से रजस्‍वला स्त्रियों को इस मंदिर से दूर ही रहना चाहिए, अन्‍यथा चण्‍डीपाठ करने वाले व्‍यक्ति को बहुत ही तीव्र दुष्‍परिणाम भोगने पडते हैं।
साथ ही दुर्गा सप्‍तशती पुस्‍तक में वर्णित विभिन्‍न नियमों का अक्षरश: पालन करना चाहिए और यदि आप संस्‍कृत श्‍लोकों को ठीक से उच्‍चारित करने में अपने आपको सहज महसूस नहीं करते, तो उस स्थिति में बेहतर यही होगा कि आप किसी जानकार पण्डित से ही दुर्गा सप्‍तशती का पाठ करवाऐं, जिसका संस्‍कृत उच्‍चारण बिल्‍कुल ठीक हो, अन्‍यथा उसके द्वारा उच्‍चारित गलत उच्‍चारणों का दुष्‍परिणाम भ्‍ाी उसी को भोगना पडेगा, जिसके लिए चण्‍डी पाठ किया जा रहा है।
चण्‍डी पाठ के दौरान सामान्‍यत: चण्‍डीपाठ करने वालों को तरह-तरह के अच्‍छे या बुरे आध्‍यात्मिक अनुभव होते हैं। उन अनुभवों को सहन करने की पूर्ण इच्‍छाशक्ति के साथ ही चण्‍डीपाठ करना चाहिए। साथ ही इस दौरान पूर्ण ब्रम्‍हचर्य का पालन करना चाहिए और वाचिक, मानसिक व शारीरिक रूप से पूरी तरह से स्‍वच्‍छता का पालन करना चाहिए।
ऐसी मान्‍यता है कि यदि आप सबकुछ ठीक से करते हैं, तो आप जिस इच्‍छा की पूर्ति के लिए चण्‍डीपाठ करते हैं, वह इच्‍छा नवरात्रि के दौरान या अधिकतम दशहरे तक पूर्ण हो जाती है लेकिन यदि आप लापरवाही व गलती करते हैं, तो इसी दौरान आपके साथ अकल्‍पनीय घटनाऐं अथवा दुर्घटनाऐं भी घटित होती हैं।

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