पुरस्कार मिलने के कुछ महीने बाद सरकारी खर्च पर उसकी पढ़ाई का इंतजाम तो हो गया। 2013 मे उन्होने इंटर पास कर लिया। इसके बाद उनको सरकारी मदद मिलना बंद हो गई। उन्होने आगे पढ़ने के लिए लखनऊ से लेकर दिल्ली तक भागदौड़ की, तो उससे कागजी कार्रवाई पूरी करा ली गई। वर्ष 2014 मे अधिकारियो ने नई सरकार बनने की बात कहकर पल्ला झाड़ लिया। इंजीनियर बनने का सपना संजोए शहंशाह को घर के हालात खराब होने पर मजबूरन जूते की फैक्ट्री मे काम करना पड़ा।शहंशाह ने बताया कि वो काला महल स्थित एक जूते की फैक्ट्री मे रोजनदारी पर सोल लगाने का काम करता है। पूरे महीने काम करने के बाद वो दो से ढाई हजार रुपये कमा पाते है। इसमे उनको अपना परिवार का भरण पोषण करना होता है।शहंशाह का कहना है कि पुरस्कार मिलने के समय उनसे मकान दिलाने का वादा किया गया था। तत्कालीन डीएम ने भी उन्हे आश्र्वासन दिया था और दुर्बल आय वर्ग मे डूडा की योजना मे मकान के लिए आवेदन कराया। इसके लिए उन्होने 2010 मे साढे़ सात हजार रुपये कर्ज लेकर नगर निगम मे ड्राफ्ट जमा किया। अब तक वो 24 हजार रुपये जमा कर चुके है, लेकिन मकान नही मिला। शहंशाह अपनी मां अनीशा बेगम के साथ सैकड़ों चक्कर काट चुका है, लेकिन उनकी सुनवाई नही होती।शहंशाह ने बताया कि अधिकारियो और कर्मचारियो के रवैए से वो दुखी है। जब वो उन्हे बताते थे कि राष्ट्रपति ने उन्हे वीरता पुरस्कार दिया है तो कई कर्मचारी उन पर हंसते थे। उनसे यहां तक कहा गया कि हम क्या करे जो तुमने जान बचाई थी। कई बार वो राष्ट्रपति द्वारा दिए गया मेडल और प्रशस्ति पत्र भी लेकर गए तो उनसे कहा गया कि अपने पास रखो इसकी कोई वैल्यू नही है।शहंशाह की मां अनीसा को मकान न मिलने से ज्यादा मलाल अपने बेटे के मेडल और प्रशस्ति पत्र को टांगने के लिए घर मे जगह न होने का है। जब भी कोई उनके घर आता है तो वो एक टूटे से सूटकेस को लाती है। उससे धूल हटाकर बेटे को मिली बहादुरी की निशानी को दिखाती है।शहंशाह का कहना है कि उन्हे प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी से बहुत आस है कि वो उनकी बात सुनेगे। गरीबो के लिए वो बहुत काम कर रहे है तो ऐसे मे उनको मकान भी दिलाएंगे। वीरता पुरस्कार प्राप्त युवक की हर संभव मदद की जाएगी। मानको को पूरा करने पर आवास मिलेगा।
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