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हिंदुओं में शुभ कार्य में सबसे पहले पितृ को पूजा जाता है। परंपराओं में उच्च स्थान मिलता है। पूर्वजों के लिए स्थान निश्चित कर चबूतरा बना कर छतरी बनवाई जाती है। इसके लिए अब भूखंड की मांग इतनी ज्यादा है कि चार वर्ग फीट जमीन की कीमत एक लाख रुपये तक हो गई है। यहां पितृ के चरण स्थापित करके अमावस्या को पूजा की जाती है।
बल्केश्वर में यमुना किनारे महादेव मंदिर के पास, बलिया की बगीची और गोरखा इमली की बगीची सहित कई स्थानों पर पितृों के स्थान बनाए गए हैं, लेकिन अब वहां जगह बमुश्किल मिल पा रही है। बल्केश्वर में यमुना किनारेे पितृ स्थान कैसे बना, इस पर सामाजिक कार्यकर्ता मनीष गर्ग बताते हैं कि स्थान बनाने से पितृों की आत्मा को शांति मिलती है, इसलिए कुछ साल पहले यह स्थल बनाने का संकल्प लिया। परंतु जहां स्थान बने, वहां देखरेख भी हो। लिहाजा स्थान के लिए कई साल पहले जगह निर्धारित की थी। इसके बाद कुछ लोगों ने पितृों के स्थान बनवा लिए।
बल्केश्वर महादेव मंदिर के सामने बनाए पितृ स्तल पर 91 चबूतरे हैं। जिसकी सभी ने सामूहिक रूप से खर्चा कर चहारदीवारी बनवा दी है, एक चौकीदार भी रहता है। हर अमावस्या को लोग पूजन करने आते हैं और खर्चे का अपना हिस्सा देकर चले जाते हैं। स्थल की देखरेख कमेटी करती है, जिसने पिछले दिनों यहां भागवत व शिवपुराण कथा भी कराई थी।
मनीष गर्ग बताते हैं कि जमीन देने का एक ग्र्रुप बना हुआ है। पहले जमीन सस्ती थी, जैसे-जैसे कम होती गई, कीमत बढ़ती गई। एक स्थान के लिए लोग एक लाख रुपये तक खर्च करते हैं। इसके अलावा बल्केश्वर में कई और जगह भी पितृ के स्थान बनवाए जा रहे हैं। किसानों से जमीन खरीदी जा रही है। परिजन जिनसे जमीन खरीदते हैं, उन्हें ही आमतौर पर पितृ स्थल की जगह देखने को धनराशि देते हैं।
विदेश से भी आते हैं लोग- अप्रवासी भारतीय भी आगरा आते हैं, तो अपने पूर्वजों के स्थान पर जरूर आकर पूजा करते हैं। इसके अलावा देश के दूसरे शहरों से भी लोग अकसर आते रहते हैं।
ऐसे होते हैं स्थान- चार से छह वर्ग फीट तक की जमीन पर ईंट बिछाई जाती हैं। इस पर दीवार बनवाकर उस पर जिन पितृ का स्थान है, उनके नाम का पत्थर लगाया जाता है। पत्थर में स्थान बनवाने वाले की भी जानकारी होती है ताकि आने वाली पीढिय़ों को अपने पूर्वजों की जानकारी रहे।
पितृदोष होता है दूर- कैला मंदिर के महंत पंडित विष्णु शर्मा बताते हैं कि इस पूजा से पितृदोष दूर होता है। आगरा में यह परंपरा काफी पुरानी है। सामूहिक रूप से स्थान बनाने केअलावा लोगों ने यमुना किनारे भी स्थान बनवाए हैं। वहां नियमित देखरेख की जाती है। 

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