विश्व में घडिय़ाल के पुनर्वास के लिए विख्यात लखनऊ का कुकरैल वन क्षेत्र जल्दी ही नई पहचान प्राप्त कर लेगा। अब कुकरैल वन क्षेत्र में वन्यजीवों का भी दीदार होगा। यहां पर वन्यजीवों की सफारी बनाई जा रही है। साथ ही कुकरैल क्षेत्र में राज्य का पहला बायोडायवर्सिटी पार्क भी विकसित किया जाएगा, जिससे ईको टूरिज्म को भी काफी बढ़ावा मिलेगा।
लखनऊ के कुकरैल वन क्षेत्र में अब लोगों को सिर्फ घडिय़ाल के बच्चों के लेकर पूर्ण विकसित घडिय़ाल ही देखने को नहीं मिलेंगे। यहां पर अन्य वन्यजीवों के भी दर्शन हो सकेंगे। यहां वन्यजीवों की सफारी बनाई जाएगी। इसमे मांसाहारी व शाकाहारी वन्यजीवों को रखा जाएगा। इस वन क्षेत्र को अब ईको टूरिज्म के तौर पर विकसित किया जाएगा।
लखनऊ में इंदिरा नगर से सटा कुकरैल जंगल है। करीब 5100 एकड़ में फैले वन क्षेत्र में तमाम पेड़-पौधों की प्रजातियां हैं। प्राकृतिक आवरण को समेटे जंगल को शहर का फेफड़ा कहा जाता है। लिहाजा, पिकनिक स्पॉट के तौर पर विकसित कुकरैल को अब राज्य की इको टूरिज्म योजना में शामिल किया गया है। ऐसे में पर्यटकों को राज्य में बढ़ावा देने के लिए कुकरैल में वन्यजीव सफारी बनाया जाएगा। इसे इटावा के लायन सफारी की तर्ज पर विकसित किया जाएगा।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एके उपाध्याय ने बताया कि कुकरैल वन क्षेत्र को ईको टूरिज्म के रूप में विकसित किया जाएगा, जिसमे टाइगर समेत मांसाहारी व शाकाहारी वन्यजीवों को रखा जाएगा। इसके लिए राजकीय निर्माण निगम को प्रोजेक्ट बनाने को कहा गया है।
शासन लेगा फैसला प्रस्ताव तैयार- वन संरक्षक लुप्तप्राय परियोजना एपी सिन्हा ने कहा कि राज्य सरकार इको टूरिज्म को बढ़ावा दे रही है। वन विभाग ने प्रोजेक्ट को तैयार कर लिया है। इस पर अगला फैसला शासन को लेना है। यहां पर्यटकों की सुविधा के लिए कैंटीन, सैर के लिए जिप्सी, गाइड, सिक्योरिटी आदि के पूरे इंतजाम होंगे।
सफारी में होंगे पांच जंतु- एपी सिन्हा ने बताया कि सफारी में टाइगर समेत पांच जंतुओं को छोड़ा जाएगा। इसमें बाघ, तेंदुआ, भालू व शाकाहारी जीवों की प्रजातियों होंगी। शाकाहारी जंतुओं से ही बाघ अपने भोजन की व्यवस्थाएं करेंगे। एपी सिन्हा ने बताया कि वन्य जीवों के रहने के स्थान की दो श्रेणियां होती हैं। इसमें इन-सीटू जहां उनका प्राकृतिक निवास क्षेत्र होता है। वहीं दूसरा एक्स-सीटू, जहां वन्य जीवों की पारिस्थितिकी के अनुसार उनके निवास योग्य क्षेत्र विकसित किया जाता है।
एपी सिन्हा के मुताबिक कुकरैल में बायोडायवर्सिटी (जैव विविधता) पार्क भी बनेगा। इसका भी प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है। इसमें लुप्त हो रहे जीव-जंतु और पक्षियों को रखा जाएगा। इनके नेचुरल ब्रीडिंग की व्यवस्था होगी। वहीं पार्क में लुप्त हो रही प्रजातियों को हाईलाइट किया जाएगा, वहीं उनके न होने से मानव व वातावरण पर पडऩे वाले दुष्प्रभावों के बारे में भी दर्शाया जाएगा।यह पार्क अभी दिल्ली, महाराष्ट्र, केरल व पुणो में हैं।
यहां से विदेश भेजे गए घडिय़ाल कुकरैल में अभी घडिय़ाल आकर्षण का केंद्र हैं। विश्व संरक्षण संघ ने 1972 में एनीमल लिस्टिंग में घडिय़ाल को अतिसंकट ग्रस्त श्रेणी में रखा। उस समय इनकी संख्या 300 रह गई थी। इसके बाद देश का पहला घडिय़ाल प्रजनन केंद्र कुकरैल में खोला गया। एपी सिन्हा के मुताबिक सेंटर में करीब पांच हजार घडिय़ाल के बच्चे तैयार किए गए जो कि देश की विभिन्न नदियों के साथ यूएसए, जापान, बांग्लादेश भी भेजे गए। इसके अलावा कुकरैल में कछुओं की 11 प्रजातियों का भी प्रजनन होता है।

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