लखनऊ- एक ओर जहाँ पूरे प्रदेश में राजनीति करवट बदल रही थी वहीं दूसरी ओर सचिवालय में धड़ल्ले से फाईलें फाड़ी जा रही थी । सचिवालय से फाड़ी फाईलें कुछ तो गलियारे में बिखरी थी और कुछ को बोरों में भरकर ठिकाने लगाने का प्रयास किया गया । घटना उस वक्त की है जब पूरे प्रदेश की निगाहें टीवी पर लगी थी और भाजपा की सीटें शेयर मार्केट में उछाल की तरह उछल रही थीं । गणना शुरू होते ही 5-10-15-20 और देखते ही देखते यह आंकड़ा 300 पार कर गया । सत्ताधारी खेमें में भगदड़ सी मच गई और धड़ाधड़ फाईलें फाड़ी जाने लगी । इस घटना से यह लगा कि फाईलें काले कारनामों से भरी थी जिन्हें छुपाने का प्रयास किया गया । इस समय सारी मीडिया भी सत्ता परिवर्तन की खबरों में मस्त थी लेकिन सूचना मिलते ही तमाम मीडिया के लोगों ने कवरेज किया । सवाल यह है कि अखिलेश यादव जिस "काम बोलता है" के बल पर चुनावी रण में थे वो सही था या मोदी के अनुसार "कारनामें बोलते हैं" यह सही था ? हालाँकि जनता जवाब दे चुकी है और फाईलों के फटने से सिद्ध भी हो गया है । माना जा रहा कि भाजपा सरकार में इसकी जांच होगी ।
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